Thursday 5 November 2015

द्विविवाह

मैं तुम्हारे प्रेम में वफ़ादार नहीं 
तुम अकेले नहीं हो 
हर क्षण मेरे मन में 
अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने वाले।

वैसे हमने बात तो कर ही रखी थी इस बारे में 
कि ऐसा कुछ हुआ 
तो हम शांतिपूर्वक अपनी अलग-अलग राह चुन लेंगे।

पर अब तुम मुझसे दोनों में से चुनने को कहो 
तो ये भी संभव नहीं।

तुम दोनों को अलग नहीं कर सकती। 
मेरे उतने ही करीब हो तुम दोनों,
तुम 
और तुम्हारे ना होने का भय

सो उस दूसरे के साथ जीने की आदत डाल लेना चाहती हूँ
नहीं चाहती कि उससे पीछा छुड़ाने के चक्कर में 
तुम मुझसे छूट जाओ.


First published in Jankipul, 2 Nov 2015.











1 comment:

probe said...

A bit like the comfort of resting on a beautiful post and the fear of not knowing which one's the last.

Powered By Blogger

FOLLOWERS

Blogger last spotted practising feminism, writing, editing, street theatre, aspirational activism.