सरकार,
हम जो ठहरे नौकर से
बन जाते हैं फन्ने खाँ
जब जाती है आपकी जाँ
हमारे बोलने भर से
….
हम थे खानाबदोश
आया हमको होश
जब हमारी भटकन
से तंग हुई आपकी अचकन
हमने महबूब समझ आपसे शिकायत की
आपने सोच लिया हमने हिमाकत की
दीवारें तो बाहर भी आपने खूब बनाईं
आपकी जेलों में क्या अलहदा होगी रुसवाई?
आप कहते हैं आप हम सबके हैं,
पर आपके आशिकों में कई तबके हैं,
आप रीझे जाते हैं उन पर जिनकी बोली है आप सी
खटकते आँखों में हम खैरख्वा लिए हाथों में आरसी
….
मुँह पे ताले लगा तो साथ चलती है परछाई भी
कई बार बना देती पर आदमी को उससे कुछ ज़्यादा ही बड़ा
शिकवों से तो रंज न करती खुदाई भी
जानती है जो उठाता सवाल उसी ने किया उसको भी खड़ा
पत्थर उठाने से पहले जान लो ये भी, जानम
हम ना होंगे तो होगी कुछ ऐसी सी सूरत
शाम में साया भी तोड़ देगा अपना आख़िरी दम
टूटे अक्स से हर ओर होगी मनहूसियत.