Monday, 23 April 2018

गंतव्य

चलती ट्रेन
पायदान पर बर्फ पांव
खिड़की की छड़ों पर सुन्न उंगलियां
छत पर पेचीदे आसनों में उलझे कूल्हे…
ये सब
आखिर कहीं न कहीं पहुंचने के लिए.
क्या वाकई
कोई नासमझ मान सकता है
खुद को पहुंचा हुआ–
बगैर सफर किए?

First published in Sadaneera, 21 Apr 2018.

No comments:

FOLLOWERS

Blogger last spotted practising feminism, writing, editing, street theatre, aspirational activism.